
चंद्रार्कभ्रमवत्सदा सुरनदीधारौधसंपातव-
ल्लोकेस्मिन् व्यवहारकालगतिवद् द्रव्यस्य पर्यायवत् ।
लोकाधस्तलवातसंगमनवत् पद्मादिकोद्भूतिवत्
चिद्रूपस्मरणं निरंतरमहो भूयाच्छिवाप्त्यैमम् ॥5॥
शिव-प्राप्ति-हेतु मैं सदा, चिद्रूप स्थिर रहूँ ही ।
ज्यों चन्द्र सूर्य भ्रें सतत, गंगा बहे घंटा घड़ी॥
व्यवहार काल सदैव बदले, द्रव्य की पर्यायवत् ।
नित अधस्तल जग तीन वायु भ्रमें कमलोत्पत्ति सर ॥६.४॥
अन्वयार्थ : जित् प्रकार संसार में
- सूर्य-चन्द्रमा निरंतर घूमते रहते हैं,
- गंगा नदी की धार निरंतर बहती रहती है,
- घंटा, घड़ी, पल आदि व्यवहार-काल का भी सदा हेर फेर होता रहता है,
- द्रव्यों की पर्यायें सदा पलटती रहती हैं,
- लोक के अधो-भाग में घनवात, तनुवात और अंबुवात ये तीनों वातें सदा घूमती रहती हैं और
- तालाब आदि में पद्म आदि सदा उत्पन्न होते रहते हैं,
अहो ! उसीप्रकार मेरे मन में भी सदा शुद्धचिद्रूप का स्मरण बना रहे जिससे मेरा कत्याण हो ।