इति हृत्कमले शुद्धचिद्रूपोऽहं हि तिष्ठतु ।
द्रव्यतो भावतस्तावद् यावदंगे स्थितिर्मम ॥6॥
मुझ द्रव्य से या भाव से, जब तक है तन में स्थिति ।
'मैं शुद्ध चिद्रूपी हि हूँ', यह रहे मन में नित्य ही ॥६.६॥
अन्वयार्थ : जब तक मैं (आत्मा) द्रव्य या भाव किसी रीति से इस शरीर में मौजूद हूँ, तब तक मेरे हृदय-कमल में शुद्धचिद्रपोऽहं (मैं शुद्धचित्स्वरूप हुँ) यह बात सदा स्थित रहे ।