+ अपनी परिणति का विश्लेषण -
दृश्यंतेऽतीव निःसाराः क्रिया वागंगचेतसां ।
कृतकृत्यत्वतः शुद्धचिद्रूपं भजता सता ॥7॥
मैं शुद्ध चिद्रूप हूँ सदा, इस ध्यान से कृतकृत्यता ।
से लगे तन मन वचन की, सब क्रिया में नि:सारता ॥६.७॥
अन्वयार्थ : मैं कृतकृत्य हो चुका हूँ - संसार में मुझे करने के लिये कुछ भी काम बाकी नहीं रहा है क्योंकि मैं शुद्धचिद्रूप के चिंतवन में दत्तचित्त हूँ इसलिये मन, वचन और शरीर की अन्य समस्त क्रियायें मुझे अत्यन्त निस्सार मालूम पड़ती हैं ।