
किंचित्कदोत्तमं क्वापि न यतो नियमान्नमः ।
तस्मादनंतशः शुद्धचिद्रूपाय प्रतिक्षणं ॥8॥
इस शुद्ध चिद्रूप से अधिक, कोई कहीं कुछ भी नहीं ।
यों मान प्रतिक्षण नमन करता, अनन्तों नित उसे ही ॥६.८॥
अन्वयार्थ : किसी काल और देश में शुद्धचिद्रूप से बढ़कर कोई भी पदार्थ उत्तम नहीं है - ऐसा मुझे पूर्ण निश्चय है, इसलिये मैं इस शुद्धचिद्रूप के लिये प्रति-समय अनन्तबार नमस्कार करता हूँ ।