
बाह्यांतः संगमंगं नृसुरपतिपदं कर्मबंधादिभावं
विद्याविज्ञानशोभाबलभवखसुखं कीर्तिरूपप्रतापं ।
राज्यागाख्यागकालास्रवकुपरिजनं वाग्मनोयानधीद्धा-
तीर्थेशत्वं ह्यनित्यं स्मर परमचलं शुद्धचिद्रूपमेकं ॥9॥
सब बाह्य अन्त: संग नर, सुरपती पद बन्धादि सब ।
कर्मों के शोभा बल वचन, विज्ञान विद्या विषय सुख ॥
यश रूप राज्य प्रताप पर्वत, वृक्ष नाम समय हृदय ।
आस्रव धरा परिवार वाहन, बुद्धि दीप्ति तीर्थंकर ॥
इत्यादि बहुविध वस्तुएं, संयोग आदि क्षणिक हैं ।
यह एक शुद्ध चिद्रूप परम अचल सुखी ध्या नित्य मैं ॥६.९॥
अन्वयार्थ : बाह्य-अभ्यंतर परिग्रह, शरीर, सुरेन्द्र और नरेंद्र का पद, कर्मबन्ध आदि भाव, विद्या, विज्ञान-कला-कौशल, शोभा, बल, जन्म, इन्द्रियों का सुख, कीर्ति, रूप, प्रताप, राज्य, पर्वत, वृक्ष, नाम, काल, आस्रव, पृथ्वी, परिवार, वाणी, मन, वाहन, बुद्धि, दीप्ति और तीर्थंकरपना आदि सब पदार्थ चलायमान अनित्य हैं; परन्तु केवल शुद्ध-चिद्रूप नित्य है और सर्वोत्तम है, इसलिये सब पदार्थों का ध्यान छोड़कर इसी का ध्यान करो ।