+ करने-योग्य कार्य क्या है? -
रागाद्या न विधातव्याः सत्यसत्यपि वस्तुनि ।
ज्ञात्वा स्वशुद्धचिद्रूपं तत्र तिष्ठ निराकुलः ॥10॥
वस्तु नहीं अच्छी बुरी, यों करो रागादि नहीं ।
निज शुद्ध चिद्रूप जान, उसमें निराकुल रह लीन भी ॥६.१०॥
अन्वयार्थ : शुद्धचिद्रूप के स्वरूप को भले-प्रकार जानकर भले-बुरे किसी भी पदार्थ में राग-द्वेष आदि न करो; सब में समता भाव रखो और निराकुल हो अपनी आत्मा में स्थिति करो ।