
चिद्रूपोऽहं स मे तस्मात्तं पश्यामि सुखी ततः ।
भवक्षितिर्हितं मुक्तिर्निर्यासोऽयं जिनागमे ॥11॥
मैं शुद्ध चिद्रूपी अत:, यह देख हूँ नित ही सुखी ।
यह जिनागम का सार, हो भव नाश यह हित शिवमयी ॥६.११॥
अन्वयार्थ : 'मैं शुद्धचिद्रूप हूं' इसलिये मैं उसको देखता हूं और उसी से मुझे सुख मिलता है । जैन शास्त्र का भी यही निचोड़ है। उसमें भी यही बात बतलाई है कि शुद्ध चिद्रूप के ध्यान से संसार का नाश और हितकारी मोक्ष प्राप्त होता है ।