
चिद्रूपे केवले शुद्धे नित्यानंदमये यदा ।
स्वे तिष्ठति तदा स्वस्थं कथ्यते परमार्थतः ॥12॥
जब शुद्ध नित्यानन्दमय, चिद्रूप में स्थिर रहे ।
तब स्वस्थ है वह एक ही, नित यों कहें परमार्थ से ॥६.१२॥
अन्वयार्थ : आत्मा स्वस्थ-स्वरूप उसी समय कहा जाता है जबकि वह सदा आनन्दमय केवल अपने शुद्धचिद्रूप में स्थिति करता है ।