+ इस संबंध में अपनी भावना -
निश्चलः परिणामोऽस्तु स्वशुद्धचिति मामकः ।
शरीरमोचनं यावदिव भूमौ सुराचलः ॥13॥
भू पर अचल नित मेरु सम, निज शुद्ध चिन्मय में अचल ।
जब तक न छूटे तन, रहे परिणति मेरी सुनिश्चल ॥६.१३॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार पृथ्वी में मेरु पर्वत निश्चलरूप से गढ़ा हुआ है जरा भी उसे कोई हिला-डुला नहीं सकता उसीप्रकार मेरी भी यही कामना है कि जब तक इस शरीर का संबंध नहीं छुटता तब तक इसी आत्मिक शुद्धचिद्रूप में मेरा भी परिणाम निश्चलरूप से स्थित रहे, जरा भी इधर उधर न भटके ।