
सदा परिणतिर्मेऽस्तु शुद्धचिद्रूपकेऽचला ।
अष्टमीभूमिकामध्ये शुभा सिद्धशिला यथा ॥14॥
ज्यों आठवीं भू में सुशुभ, सिद्धी शिला मुझ परिणति ।
निज शुद्ध चिद्रूप में रहे निश्चल सुथिर संतुष्ट भी ॥६.१४॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार आठवीं पृथ्वी मोक्ष में, अत्यन्त शुभ सिद्धशिला निश्चलरूप से विराजमान है उसीप्रकार मेरी परिणति भी इस शुद्धचिदूप में निश्चलरूप से स्थित रहे ।