
चलंति सन्मुनीन्द्राणां निर्मलानि मनांसि न ।
शुद्धचिद्रूपसद्ध्यानात् सिद्धक्षेत्राच्छिवा यथा ॥15॥
ज्यों हितमयी सिद्ध क्षेत्र से, नहिं चलें सिद्ध मुनीन्द्र का ।
निर्मल हृदय निज शुद्ध चिद्रूप ध्यान से अविचल तथा ॥६.१५॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार कल्याणकारी सिद्धक्षेत्र से सिद्ध भगवान् किसी रीति से चलायमान नहीं होते उसी प्रकार उत्तम मुनियों के निर्मल मन भी शुद्धचिद्रूप के ध्यान से कभी चल-विचल नहीं होते ।