+ मुनिराजों की दृढ़ परिणति का कारण -
मुनीश्वरैस्तथाभ्यासो दृढः सम्यग्विधीयते ।
मानसं शुद्धचिद्रूपे यथाऽत्यंतं स्थिरीभवेत् ॥16॥
'मैं शुद्ध चिद्रूप' में सदा, अभ्यास करते मुनीश्वर ।
अत्यन्त स्थिर दृढ़ अचल मन से यही ध्या नहिं अथिर ॥६.१६॥
अन्वयार्थ : मुनिगण इस रूप से शुद्धचिद्रूप के ध्यान का दृढ़ अभ्यास करते हैं कि उनका मन शुद्धचिद्रूप के ध्यान में सदा निश्चलरूप से स्थित बना रहे, जरा भी इधर-उधर चल-विचल न हो सके ।