+ सभी प्रसंगों में अपनी चिद्रूप-भावना -
सुखे दुःखे महारोगे क्षुधादीनामुपद्रवे ।
चतुर्विधोपसर्गे च कुर्वे चिद्रूपचिंतनं ॥17॥
सुख दु:ख भूखादि उपद्रव, महा रोगों चतुर्धा ।
उपसर्ग में चिद्रूप चिन्तन, अचल होऊँ इसे ध्या ॥६.१७॥
अन्वयार्थ : सुख-दुःख, उग्र-रोग और भूख-प्यास आदि के भयंकर उपद्रवों में तथा मनुष्यकृत, देवकृत, तिर्यञ्चकृत और अचेतनकृत चारों प्रकार के उपसर्ग में मैं शुद्धचिद्रूप का ही चिन्तवन करता रहूँ, मुझे उनके उपद्रव से उत्पन्न वेदना का जरा भी अनुभव न हो ।