
निश्चलं न कृतं चित्तमनादौ भ्रमतो भवे ।
चिद्रूपे तेन सोढानि महादुःखान्यहो मया ॥18॥
नित अनादि से घूमते, भव में नहीं मैंने किया ।
चिद्रूप में मन अचल, इससे घोर दु:खों को सहा ॥६.१८॥
अन्वयार्थ : इस संसार में मैं अनादिकाल से घूम रहा हूँ । हाय ! मैंने कभी भी शुद्धचिद्रूप में अपना मन निश्चलरूप में न लगाया इसलिये मुझें अनन्त दुःख भोगने पड़े ।