
चिद्रूपे तारतम्येन गुणस्थानाच्चतुर्थतः ।
मिथ्यात्वाद्युदयाद्यख्यमलापायाद् विशुद्धता ॥3॥
मिथ्यात्व आदि के उदय मय, मलों के सु विनाश से ।
चिद्रूप में तारतम्य से, हो विशुद्धि गुण चतुर्थ से ॥६.३॥
अन्वयार्थ : गुणस्थानों में चढ़नेवाले जीवों को चौथे गुणस्थान से मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया और लोभरूप मलोंका ज्यों-ज्यों नाश होता जाता है वैसा ही वैसा चिद्रूप भी विशुद्ध होता चला जाता है ।