
मोक्षस्वर्गार्थिनां पुंसां तात्त्विकव्यवहारिणां ।
पंथाः पृथक् पृथक् रूपो नागरागारिणामिव ॥4॥
ज्यों पृथक्-पृथक् नगर गमन के पथ पृथक् ही हों सदा ।
तात्त्विक शिवार्थी स्वर्ग अर्थी, अतात्त्विक पथ पृथक्ता ॥७.४॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार भिन्न-भिन्न नगर के जाने वाले पथिकों के मार्ग भिन्न-भिन्न होते हैं, उसीप्रकार मोक्ष के इच्छुक तात्त्विक पुरुषों का व स्वर्ग के इच्छुक अतात्त्विक पुरुषों का मार्ग भिन्त-भिन्न है ।