+ व्यवहार को छोड़कर निश्चय को स्वीकार करने की आज्ञा -
चिंताक्लेशकषायशोकबहुले देहादिसाध्यात्परा-
धीने कर्मनिबन्धनेऽतिविषमे मार्गे भयाशान्विते ।
व्यामोहे व्यवहारनामनि गतिं हित्वा व्रजात्मन् सदा
शुद्धे निश्चयनामनीह सुखदेऽमुत्रापि दोषोज्झिते ॥5॥
व्यवहार और निश्चय मार्ग की तुलना करते हुए
चिन्ता क्लेश कषाय शोक बहुल तनादि साध्य से ।
परतन्त्र कर्म निबन्धनी, अति विषम आशा भयों से ॥
परिपूर्ण व्यामोही दशा, व्यवहार को तज ग्रहण कर ।
नित सुखद दोषों से रहित, यह शुद्ध निश्चय का विषय ॥७.५॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन्‌ ! यह व्यवहार मार्ग चिन्ता, क्लेश, कषाय और शोक से जटिल है । देह आदि द्वारा साध्य होनेसे पराधीन है। कर्मों के लाने में कारण है । अत्यन्त विकट, भय और आशा से व्याप्त है और व्यामोह करानेवाला है; परन्तु शुद्ध-निश्वयनय रूप मार्ग में कोई विपत्ति नहीं है, इसलिये तू व्यवहारनय को त्यागकर शुद्ध-निश्वयनयरूप मार्ग का अवलंबन कर; क्योंकि यह इस लोक की क्‍या बात ? परलोक में भी सुख का देनेवाला है और समस्त दोषों से रहित निर्दोष है ।