
न भक्तवृंदैर्न च शिष्यवर्गैर्न पुस्तकाद्यैर्न च देहमुख्यैः ।
न कर्मणा केन ममास्ति कार्यं विशुद्धचित्यस्तु लयः सदैव ॥6॥
नहिं भक्त गण से प्रयोजन, नहिं शिष्य पुस्तक तनादि ।
नहिं कार्य कुछ करना मुझे, मैं लीन शुध चिद्रूप ही ॥७.६॥
अन्वयार्थ : मेरा मन शुद्धचिद्रूप की प्राप्ती के लिये उत्सुक है, इसलिये न तो संसार में मुझे भक्तों की आवश्यक्ता है, न शिष्यवर्ग, पुस्तक, देह आदि से ही कुछ प्रयोजन है एवं न मुझे कोई काम करना ही अभीष्ट है। केवल मेरी यही कामना है कि मेरी परिणति सदा शुद्धचिद्रूप में ही लीन रहे । सिवाय शुद्धचिद्रूप के, बाह्य किसी पदार्थ में जरा भी न जाय ।