न चेतसा स्पर्शमहं करोमि सचेतनाचेतनवस्तुजाते ।
विमुच्य शुद्धं हि निजात्मतत्त्वं क्वचित्कदाचित्कथमप्यवश्यं ॥7॥
निज शुद्ध चिद्रूप तत्त्व तज मैं कभी कुछ कैसे कहीं ।
भी चेतनाचेतन पदार्थों का करूँ चिन्तन नहीं ॥७.७॥
अन्वयार्थ : मेरी यह कामना है कि शुद्धचिद्रूप नामक पदार्थ को छोड़कर मैं किसी भी चेतन या अचेतन पदार्थ का किसी देश और किसी काल में कभी भी अपने मन से स्पर्श न करूँ ।