
व्यवहारं समालंब्य येऽक्षि कुर्वंति निश्चये ।
शुद्धचिद्रूपसंप्राप्तिस्तेपामेवेतरस्य न ॥8॥
व्यवहार को अवलम्ब जो, दृष्टि करें निश्चय नियत ।
निज शुद्ध चिद्रूप लब्धि उनको, नहीं पाते अन्य जन ॥७.८॥
अन्वयार्थ : व्यवहारनय का अवलंबन कर जो महानुभाव अपनी दृष्टि को शुद्ध निश्चयनय की ओर लगाते हैं, उन्हें ही संसार में शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति होती है। अन्य मनुष्यों को शुद्धचिद्रूप का लाभ कदापि नहीं हो सकता ।