
संपर्कात् कर्मणोऽशुद्धं मलस्य वसनं यथा ।
व्यवहारेण चिद्रूपं शुद्धं तन्निश्चयाश्रयात् ॥9॥
ज्यों वस्त्र मैला मलिनता से, कर्म बन्धन से अशुद्ध ।
व्यवहार से चिद्रूप निश्चय की अपेक्षा पूर्ण शुद्ध ॥७.९॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार निर्मल वस्त्र भी मैल से मलिन हो जाता है, उसी प्रकार व्यवहारनय से कर्म के संबंध से शुद्धचिद्रूप भी अशुद्ध है; परन्तु शुद्ध निश्वयनय की दृष्टि से वह शुद्ध ही है ।