+ नय-विवक्षा -
अशुद्धं कथ्यते स्वर्णमन्यद्रव्येण मिश्रितं ।
व्यवहारं समाश्रित्य शुद्धं निश्चयतो यथा ॥10॥
युक्तं तथाऽन्यद्रव्येणाशुद्धं चिद्रूपमुच्यते ।
व्यवहारनयात् शुद्धं निश्चयात् पुनरेव तत् ॥11॥
व्यवहार दृष्टि से अशुद्ध, अन्य के संयोग से ।
है स्वर्ण शुद्ध सदैव, एकाकी सुनिश्चय दृष्टि से ॥७.१०॥
त्यों कर्म बन्धन अपेक्षा, व्यवहार नय से अशुद्ध है ।
चिद्रूप ही निश्चय अपेक्षा, पूर्ण शुद्ध प्रभु कहें ॥७.११॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार व्यवहारनय से शुद्ध सोना भी अन्य द्रव्य के मेल से अशुद्ध और वही निश्चयनय से शुद्ध कहा जाता है, उसी प्रकार शुद्धचिद्रूप भी कर्म आदि निकृष्ट द्रव्यों के सम्बन्ध से व्यवहारनय की अपेक्षा अशुद्ध कहा जाता है और वही शुद्ध-निश्चयनय की अपेक्षा शुद्ध कहा जाता है ।