+ चिद्रूप के शुद्ध होने का क्रम -
बाह्यांतरन्यसंपर्को येनांशेन वियुज्यते ।
तेनांशेन विशुद्धिः स्याद् चिद्रूपस्य सुवर्णवत् ॥12॥
ज्यों बाह्य अन्त: मलिनता, जितनी मिटी है शुद्ध ही ।
वह स्वर्ण त्यों चिद्रूप के, क्रमश: विशुद्धि व्यक्त ही ॥७.१२॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार स्वर्ण बाहर भीतर जितने भी अंश अन्य द्रव्य के संबंध से छूट जाता है तो वह उतने अंश में शुद्ध कहा जाता है, उसीप्रकार चिद्रूप के भी जितने अंश से कर्म-मल का संबंध नष्ट हो जाता है उतने अंश में वह शुद्ध कहा जाता है ।