
शुद्धचिद्रूपसद्ध्यानपर्वतारोहणं सुधीः ।
कुर्वन् करोति सुदृष्टिर्व्यवहारावलंबनं ॥13॥
आरुह्य शुद्धचिद्रूप ध्यानपर्वतमुत्तमं ।
तिष्ठेद् यावत्त्यजेत्तावद् व्यवहारावलंबनं ॥14॥
इस शुद्ध चिद्रूप ध्यान रूपी, पर्वतारोहण समय ।
व्यवहार अवलम्बन ग्रहें, सुदृष्टि विज्ञ विवेकमय ॥७.१३॥
पर शुद्ध चिद्रूप ध्यान मय, उत्तम गिरी आरूढ़ हो ।
व्यवहार अवलम्बन तजें, निज रूप में सन्तुष्ट हो ॥७.१४॥
अन्वयार्थ : विद्वान मनुष्य जब तक शुद्धचिद्रूप के ध्यानरूपी विशाल पर्वत पर आरोहण करता है तब तक तो व्यवहार-नय का अवलंबन करता है; परन्तु ज्यों ही शुद्धचिद्रूप के ध्यान रूपी विशाल पर्वत पर चढ़कर वह निश्चलरूप से विराज-मान हो जाता है, उसी समय व्यवहारनय का सहारा छोड़ देता है ।