+ निश्चय, व्यवहार की विधि -
जिनागमे प्रतीतिः स्याज्जिनस्याचरणेऽपि च ।
निश्चयं व्यवहारं तन्नयं भज यथाविधि ॥18॥
नित यथाविधि व्यवहार निश्चय नय समझ आश्रय करो ।
जिससे जिनागम में रुचि, जिन आचरण में भक्ति हो ॥७.१८॥
अन्वयार्थ : व्यवहार और, निश्चयनय का जैसा स्वरूप बतलाया है उसीप्रकार उसे जानकर उनका इस रीति में अवलंबन करना चाहिये जिससे कि जैन शास्त्रों में विश्वास और भगवान जिनेन्द्र के उक्त चारित्र में भक्ति बनी रहे ।