
व्यवहारं विना केचिन्नष्टा केवलनिश्चयात् ।
निश्चयेन विना केचित् केवलव्यवहारतः ॥19॥
वे मात्र निश्चय से हुए हैं भ्रष्ट कुछ व्यवहार बिन ।
व्यवहार केवल से हुए हैं भ्रष्ट कुछ परमार्थ बिन ॥७.१९॥
अन्वयार्थ : अनेक मनुष्य तो संसार में व्यवहार का सर्वथा परित्याग कर केवल शुद्धनिश्चयनय के अवलंबन से नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं और बहुत से निश्चयनय को छोड़कर केवल व्यवहार का ही अवलंबन कर नष्ट हो जाते हैं ।