
व्यवहाराद्बहिः कार्यं कुर्याद्विधिनियोजितं ।
निश्चयं चांतरं धृत्वा तत्त्वेदी सुनिश्चलं ॥22॥
नित तत्त्ववेदी अन्तरंग में सुनिश्चल निश्चय ग्रहण ।
कर बाह्य में व्यवहार से करते करम विधि पूर्वक ॥७.२२॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव तत्त्वज्ञानी हैं, वे अन्तरंग में भले-प्रकार निश्चयनय को धारण कर व्यवहारनय से अवसर देखकर बाह्म में कार्य का संपादन करते हैं ।