+ चिद्रूप को प्राप्त करने की पात्रता -
छेत्रीसूचिक्रकचपवनैः सीसकाग्न्यूषयंत्रै
स्तुल्या पाथः कतकफ लबद्धंसपक्षिस्वभावा ।
शस्त्रीजायुस्वधितिसदृशा टंकवैशाखबद्वा
प्रज्ञा यस्योद्भवति हि भिदे तस्य चिद्रूपलब्धिः ॥1॥
जिसकी मती छैनी सुई, आरा पवन सीसा अनल ।
जल कोलु दाँता कतकफल, औषध छुरी वैशाखवत् ॥
टाँकी मरालादि प्रकृतिवत्, भेद करना जानती ।
परमार्थ निज पर वस्तु का, चिद्रूप प्राप्ति उसे ही ॥८.१॥
अन्वयार्थ : जिस महानुभाव की बुद्धि छेनी, सुई, आरा, पवन, सीसा, अग्नि, ऊषयंत्र (कोल) कतकफल (फिटकरी), हंसपक्षी, छुरी, जायू, दांता, टांकी और वैशाख के समान जड़ और चेतन के भेद करने में समर्थ हो गई है, उसी महानुभाव को चिद्रूप की प्राप्ति होती है ।