
स्वर्णं पाषाणसूताद्वसनमिव मलात्ताम्ररूप्यादि हेम्नो
वा लोहादग्निरिक्षो रस इह जलवत्कर्दमात्केकिपक्षात् ।
ताम्रं तैलं तिलादेः रजतमिव किलोपायतस्ताम्रमुख्यात्
दुग्धान्नीरं घृतं च क्रियत इव पृथक् ज्ञानिनात्मा शरीरात् ॥2॥
ज्यों स्वर्ण पत्थर से स्वर्ण मैल से पट स्वर्ण से ।
नित ताम्र चाँदी आदि लोहे से अनल ताम्रादि से ॥
ज्यों रजत जल घृत दूध से, इक्षु से रस मोर पंख से ।
करते पृथक् ताँबा सु ज्ञानी निजातम को देह से ॥८.२॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार स्वर्णपाषाण से सोना भिन्न किया जाता है, मैल से वस्त्र, सोने से तांबा-चांदी आदि पदार्थ, लोहे से अग्नि, ईख से रस, कीचड़ से जल, केकी के पंख से ताँबा, तिल आदि से तेल, तांबा आदि धातुओं से चांदी और दूध से जल एवं घी भिन्न कर लिया जाता है, उसीप्रकार जो मनुष्य ज्ञानी है - जड़ चेतन का वास्तविक ज्ञान रखता है वह शरीर से आत्मा को भिन्न कर पहिचानता है ।