+ पर को छोड़कर चिद्रूप की भावना -
देशं राष्ट्रं पुराद्यं स्वजनवनधनं वर्णपक्षं स्वकीय
ज्ञातिं संबंधिवर्गं कुलपरिजनकं सोदरं पुत्रजाये ।
देहं हृद्वाग्निभावान् विकृतिगुणविधीन् कारकादीनि भित्वा
शुद्धं चिद्रूपमेकं सहजगुणनिधिं निर्विभागं स्मरामि ॥3॥
धन वन स्वजन नगरादि राष्ट्र, देश अपनी जाति तन ।
मन वचन संबन्धी सहोदर, सुत तिया कुल परीजन ॥
निज वर्ग पक्ष विभाव विकृति, कारकादि गुणविधि ।
इत्यादि सब मुझसे पृथक्, यों मान इनसे पृथक् ही ॥
इन सभी को नित कर पृथक्, मैं एक शुद्ध चिद्रूप ही ।
अविभाग गुणनिधि सहज ध्याऊँ स्मरूँ मैं एक ही ॥८.३॥
अन्वयार्थ : देश, राष्ट्र, पुरगाँव, स्वजन-समुदाय, धन, वन, ब्राह्मण आदि वर्णों का पक्षपात, जाति, संबन्धी, कुल, परिवार, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, हृदय और वाणी ये सब पदार्थ विकार के करनेवाले हैं - इनको अपना मानकर स्मरण करने से ही चित्त, शुद्धचिद्रूप की ओर से हट जाता है, चंचल हो उठता है तथा मैं कर्त्ता और कारण आदि हूँ इत्यादि कारकों के स्वीकार करने से भी चित्त में चल-विचलता उत्पन्न हो जाती है - इसलिये स्वाभाविक गुणों के भंडार शुद्धचिद्रूप को ही मैं निरविभागरूप से कर्त्ता-कारण का कुछ भी भेद न कर स्मरण कर मनन, ध्यान करता हूं ।