
नात्मध्यानात्परं सौख्यं नात्मध्यानात् परं तपः ।
नात्मध्यानात्परो मोक्षपथः क्वापि कदाचन ॥5॥
निज आत्म-ध्यान से श्रेष्ठ कोई सुख नहीं तप भी नहीं ।
नहिं अन्य कोई मोक्ष-पथ, यों करो आतम-ध्यान ही ॥८.५॥
अन्वयार्थ : इस आत्मध्यान से बढ़कर न तो कहीं किसी काल में कोई सुख है, न तप है और न मोक्ष ही है, इसलिये इसी को परम कल्याण का कर्त्ता समझना चाहिये ।