
केचित्प्राप्य यशः सुखं वरवधूं रायं सुतं सेवकं
स्वामित्वं वरवाहनं बलसुहृत्पांडित्यरूपादिकं ।
मन्यंते सफलं स्वजन्ममुदिता मोहाभिभूता नरा ।
मन्येऽहं च दुरापयात्मवपुषोर्ज्ञप्त्या भिदः केवलं ॥6॥
सब मोह मोहित मती यश, इन्द्रियज सुख नृप सुत सुहृत् ।
उत्तम तिया बल रूप वाहन, पण्डिताई प्राप्त कर ॥
इत्यादि उत्तम वस्तुएं, पा नर जनम मानें सफल ।
मैं मानता तन आत्मा के, भेद ज्ञान से नित सफल ॥८.६॥
अन्वयार्थ : मोह के मद में मत्त बहुत से मनुष्य कीर्ति प्राप्त होने से ही अपना जन्म धन्य समझते हैं; अनेक इंद्रियजन्य-सुख, सुन्दर स्त्री, धन, पुत्र, उत्तम सेवक, स्वामीपना और उत्तम सवारियों की प्राप्ति से अपना जन्म सफल मानते हैं और बहुतों को बल, उत्तम मित्र, विद्वत्ता और मनोहररूप आदि की प्राप्ति से संतोष हो जाता है; एरन्तु मैं आत्मा और शरीर के भेद-विज्ञान से अपना जन्म सफल मानता हूँ ।