+ भेद-विज्ञान से सम्पूर्ण कर्मों का अभाव -
तावत्तिष्ठंति चिद्भूमौ दुर्भेद्याः कर्मपर्वताः ।
भेदविज्ञानवजंर न यावत्पतति मूर्द्धनि ॥7॥
हैं रहें नित चैतन्य भू पर, कर्म गिरि दुर्भेद्य मय ।
जब तक पड़े नहिं भेद-ज्ञानमयी पवी उन शीश पर ॥८.७॥
अन्वयार्थ : आत्मारूपी भूमि में कर्मरूपी अभेद्य पर्वत, तभी तक निश्चलरूप से स्थिर रह सकते हैं, जब तक भेद-विज्ञान रूपी वज्र इनके मस्तक पर पड़ कर इन्हें चुर्ण-चूर्ण नहीं कर डालता ।