+ उत्तरोत्तर दुर्लभता का प्रतिपादन -
दुर्लभोऽत्र जगन्मध्ये चिद्रूपरुचिकारकः ।
ततोऽपि दुर्लभं शास्त्रं चिद्रूपप्रतिपादकं ॥8॥
ततोऽपि दुर्लभो लोके गुरुस्तदुपदेशकः ।
ततोऽपि दुर्लभं भेदज्ञानं चिंतामणिर्यथा ॥9॥
दुर्लभ यहाँ जग में सदा, चिद्रूप रुचि कारक कहे ।
उनसे भि दुर्लभ शुद्ध चिद्रूप निरूपक नित शास्त्र हैं ॥८.८॥
उन शास्त्र उपदेशक गुरु, उनसे भि दुर्लभ लोक में ।
चिन्तामणि सम भेदमय, विज्ञान दुर्लभ उन्हीं से ॥८.९॥
अन्वयार्थ : जो पदार्थ चिद्रूप से प्रेम कराने वाला है वह संसार में दुर्लभ है; उससे भी दुर्लभ चिद्रूप के स्वरूप का प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र है; यदि शास्त्र भी प्राप्त हो जाय तो चिद्रप के स्वरूप का उपदेशक गुरु नहीं मिलता, इसलिये उससे गुरु की प्राप्ति दुर्लभ है; गुरु भी प्राप्त हो जाय तो भी जिस प्रकार चिन्तामणि रत्न की प्राप्ति दुर्लभ है, उसीप्रकार भेद-विज्ञान की प्राप्ति भी दुष्प्राप्य है ।