
स्वकीयं शुद्धचिद्रूपं भेदज्ञानं विना कदा ।
तपःश्रुतवतां मध्ये न प्राप्तं केनचित् क्वचित् ॥11॥
बहु तपस्वी शास्त्रज्ञ भी, निज शुद्ध चिद्रूप को सभी ।
भेदज्ञान बिन कैसे कहीं भी, नहीं पा सकते कभी ॥८.११॥
अन्वयार्थ : शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति, बिना भेद-विज्ञान के कदापि नहीं हो सकती, इसलिये तपस्वी या शास्त्र किसी महानुभाव ने बिना भेद-विज्ञान के आजतक कहीं भी शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति न कर पाई और न कर ही सकता है ।