
क्षयं नयति भेदज्ञश्चिद्रूपप्रतिघातकं ।
क्षणेन कर्मणां राशिं तृणानां पावको यथा ॥12॥
तृण राशि को ज्यों आग क्षण में, भस्म कर देती सभी ।
त्यों क्षय करे चिद्रूप-घातक, सभी को भेदज्ञ ही ॥८.१२॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार अग्नि देखते देखते तृणों के समूह को जलाकर खाक कर देती है, उसीप्रकार जो भेद-विज्ञानी है वह शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति को नाश करनेवाले कर्म-समूह को क्षण-भर में समूल नष्ट कर देता है ।