
अछिन्नधारया भेदबोधनं भावयेत् सुधीः ।
शुद्धचिद्रूपसंप्राप्त्यै सर्वशास्त्रविशारदः ॥13॥
सब शास्त्र पारंगत सुधी, चिद्रूप प्राप्ति के लिए ।
निर्बाध धारा से सतत, भेद-ज्ञान ही भाया करे ॥८.१३॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव समस्त शास्त्रों में विशारद है और शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति का अभिलाषी है, उसे चाहिये कि वह एकाग्र हो भेद-विज्ञान की ही भावना करे; भेद-विज्ञान से अतिरिक्त किसी पदार्थ में ध्यान न लगाये ।