+ भेद-ज्ञान का फल -
संवरोनिर्जरा साक्षात् जायते स्वात्मबोधनात् ।
तद्भेदज्ञानतस्तस्मात्तच्च भाव्यं मुमुक्षुणा ॥14॥
निज आतमा के ज्ञान से, साक्षात् संवर निर्जरा ।
वह व्यक्त भेद-विज्ञान से, यों मुमुक्षु को भावना ॥८.१४॥
अन्वयार्थ : अपने-आत्मा के ज्ञान से संवर और निर्जरा की प्राप्ति होती है । आत्मा का ज्ञान भेद-विज्ञान से होता है, इसलिये मोक्षाभिलाषी को चाहिये कि वह भेद-विज्ञान की ही भावना करे ।