
चिद्रूपच्छादको मोहरेणुराशिर्नं बुध्यते ।
क्व यातीति शरीरात्मभेदज्ञानप्रभंजनात् ॥16॥
तन आतमा में भेद के, विज्ञानमय तूफान से ।
चिद्रूप-छादक मोह धूली, नष्ट हो जड़ मूल से ॥८.१६॥
अन्वयार्थ : शरीर और आत्मा के भेद-विज्ञानरूपी महापवन से चिद्रूप के स्वरूप को ढंकनेवाली मोह की रेणुयें न मालूम कहाँ किनारा कर जाती है?