
भेदज्ञानं प्रदीपोऽस्ति शुद्धचिद्रूपदर्शने ।
अनादिजमहामोहतामसच्छेदनेऽपि च ॥17॥
है अनादि अति मोह तम, नाशक प्रदर्शक चिन्मयी ।
है दीप्त उत्तम दीप कहते शुद्ध भेद-विज्ञान ही ॥८.१७॥
अन्वयार्थ : यह भेदविज्ञान, शुद्धचिद्रूप के दर्शन में जाज्वल्यमान दीपक है और अनादिकाल से विद्यमान मोह रूपी प्रबल अंधकार का नाश करनेवाला है ।