+ भेद-ज्ञानरूपी नेत्र की महिमा -
भेदविज्ञाननेत्रेण योगी साक्षादवेक्षते ।
सिद्धस्थाने शरीरे वा चिद्रूपं कर्मणोज्झितं ॥18॥
सत् भेद-विज्ञान नेत्र से, साक्षात् देखें योगि-गण ।
नित सिद्ध स्थल में या तन में, कर्म बिन चिद्रूप स्व ॥८.१८॥
अन्वयार्थ : योगीगण भेद-विज्ञानरूपी नेत्र की सहायता से सिद्धस्थान और शरीर में विद्यमान समस्त कर्म से रहित शुद्धचिद्रूप को स्पप्टरूप से देख लेते हैं ।