
मिलितानेकवस्तूनां स्वरूपं हि पृथक् पृथक् ।
स्पर्शादिभिर्विदग्धेन निःशंकं ज्ञायते यथा ॥19॥
तथैव मिलितानां हि शुद्धचिद्देहकर्मणां ।
अनुभूत्या कथं सद्भिः स्वरूपं न पृथक् पृथक् ॥20॥
नित परस्पर मिश्रित अनेकों, वस्तुओं का भिन्न भिन्न ।
स्व रूप स्पर्शादि द्वारा, जानते नि:शंक विज्ञ ॥८.१९॥
त्यों मिले पर हैं भिन्न भिन्न शुद्ध चेतन तन करम ।
सद् विज्ञ अनुभूति से जानें, पृथक्-पृथक् स्वरूप सब ॥८.२०॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार विद्वान मनुष्य आपस में मिले हुये अनेक पदार्थों का स्वरूप स्पर्श आदि के द्वारा स्पष्टरूप से भिन्न-भिन्न पहिचान लेते हैं, उसीप्रकार आपस में अनादिकाल से मिले हुये शुद्धचिद्रूप, शरीर और कर्म के स्वरूप को भी अनुभवज्ञान के बल से सत्पुरुषों द्वारा भिन्न-भिन्न क्यों न जाना जाय ?