+ उदाहरण द्वारा भेद-ज्ञान के फल -
आत्मानं देहकर्माणि भेदज्ञाने समागते ।
मुक्त्वा यांति यथा सर्पा गरुडे चंदनद्रुमं ॥21॥
जैसे गरुड़ को देख चन्दन तरु लिपटे सर्प भी ।
नित भाग जाते छोड़कर, त्यों आत्मा तन कर्म भी ॥
यद्यपि अनादि से मिले, पर पारमार्थिक भेद का ।
विज्ञान प्रगटा तन करम, आतम से भिन्न हुआ सदा ॥८.२१॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार चन्दन वृक्ष पर लिपटा हुआ सर्प अपने बैरी गरुड़ पक्षी को देखते ही तत्काल आँखों से ओझल हो जाता है, पता लगाने पर भी उसका पता नहीं लगता; उसीप्रकार भेद-विज्ञान के उत्पन्न होते ही समस्त देह तथा कर्म आत्मा को छोड़कर न मालूम कहां लापता हो जाते हैं, विरोधी भेदविज्ञान के उत्पन्न होते ही कर्मों की सूरत भी नहीं दीख पड़ती ।