भेदज्ञानबलात् शुद्धचिद्रूपं प्राप्य केवली ।
भवेद्देवाधिदेवोऽपि तीर्थकर्त्ता जिनेश्वरः ॥22॥
पा शुद्ध-चिद्रूप भेद-ज्ञान प्रभाव से सर्वज्ञ हो ।
देवाधिदेव जिनेश, तीर्थंकर हुआ शोभित अहो ॥८.२२॥
अन्वयार्थ : इसी भेदविज्ञान के बल से यह आत्मा शुद्धचिद्रूप को प्राप्तकर केवलज्ञानी, तीर्थंकर और जिनेश्वर और देवाधिदेव होता है ।