दत्तो मानोऽपमानो मे जल्पिता कीर्त्तिरुज्ज्वला ।
अनुज्ज्वलापकीर्त्तिर्वा मोहस्तेनेति चिंतनं ॥2॥
अपमान मान दिया, सुपावन यश मलिन अपयश किया ।
इत्यादि चिन्तन मोह, क्योंकि लेन देन नहीं यहाँ ॥९.२॥
अन्वयार्थ : इसने मेरा आदर सत्कार किया, इसने मेरा अपमान (अनादर) किया, इसने मेरी उज्ज्वल कीर्ति फैलाई और इसने मेरी अपकीत्ति फैलाई, इस प्रकार का विचार मन में लाना ही मोह है।