किं करोमि क्व यामीदं क्व लभेय सुखं कृतः ।
किमाश्रयामि किं वच्मि मोहचिंतनमीदृशं ॥3॥
क्या करूँ मैं जाऊँ कहाँ, कैसे मिले सुख कहाँ से?
पाऊँ शरण किसकी कहूँ क्या? मोह चिन्तन सभी ये ॥९.३॥
अन्वयार्थ : मैं क्‍या करूं ? कहां जाऊं ? कैसे सुखी होऊं ? किसका सहारा लूं ? और क्या कहूं ? इस प्रकार का विचार करना भी मोह है ।