
चेतनाचेतने रागो द्वेषो मिथ्यामतिर्मम ।
मोहरूपमिदं सर्वंचिद्रूपोऽहं हि केवलः ॥4॥
मुझ मती मिथ्या यही, राग द्वेष है जड़ जीव में ।
यह मोह का ही रूप सब, चिद्रूप केवल सदा मैं ॥९.४॥
अन्वयार्थ : ये जो संसार में चेतन-अचेतन रूप पदार्थ दृष्टिगोचर होते हैं वे मेरे हैं या दूसरे के हैं, इस प्रकार राग और द्वेषरूप विचार करना मिथ्या है; क्योंकि ये सब मोह-स्वरूप है और मेरा स्वरूप शुद्ध-चिद्रूप है, इसलिये ये मेरे कभी नहीं हो सकते ।