देहोऽहं मे स वा कर्मोदयोऽहं वाप्यसौ मम ।
कलत्रादिरहं वा मे मोहोऽदश्चिंतनं किल ॥5॥
तन मैं यही मेरा कर्म का उदय मैं मेरा यही ।
सुत तिया सब मैं, हुए मेरे मोह चिन्तन सब यही ॥९.५॥
अन्वयार्थ : मैं शरीर-स्वरूप हूँ और शरीर मेरा है, मैं कर्म का उदय-स्वरूप हूँ और कर्म का उदय मेरा है, मैं स्त्री पुत्र आदि स्वरूप हूँ और स्त्री पुत्र आदि मेरे हैं, इस प्रकार का विचार करना भी सर्वथा मोह है - देह आदि में मोह के होने से ही ऐसे विकल्प होते हैं ।