
तज्जये व्यवहारेण संत्युपाया अनेकशः ।
निश्चयेनेति मे शुद्धचिद्रूपोऽहं स चिंतनं ॥6॥
व्यवहार से इस पर विजय के, अनेकों साधन कहे ।
परमार्थ से चिद्रूप शुद्ध, यही मैं मेरा कहें ॥९.६॥
अन्वयार्थ : व्यवहारनय से इस उपयुक्त मोह के नाश करने के लिये बहुत से उपाय हैं, निश्चयनय से 'मैं शुद्ध-चिद्रूप हूँ; वही मेरा है' ऐसा विचार करने मात्र से ही इसका सर्वथा नाश हो जाता है ।