+ निश्चिंत होकर आत्म-चिंतन करने-हेतु प्रेरणा -
धर्मोद्धारविनाशनादि कुरुते कालो यथा रोचते
स्वस्यान्यस्य सुखासुखं वरखजं कर्मैव पूर्वार्जितं ।
अन्ये येऽपि यथैव संति हि तथैवार्थाश्च तिष्ठंति ते
तच्चिंतामिति मा विधेहि कुरु ते शुद्धात्मनश्चिंतनं ॥7॥
हैं काल-कृत ही धर्म के, उद्धार-नाशादि सभी ।
इन्द्रियज उत्तम सौख्य दुख, स्व-पर उपार्जित कर्म ही ॥
हैं अन्य भी जो अर्थ जैसे, वहाँ ही रहते सभी ।
मत करो चिन्ता, करो चिन्तन, शुद्ध आतम मैं यही ॥९.७॥
अन्वयार्थ : काल के अनुसार धर्म का उद्धार व विनाश होता है; पहिले का उपार्जन किया हुआ कर्म ही इन्द्रियों के उत्तमोत्तम सुख और नाना प्रकार के क्‍लेश हैं । जो अन्य पदार्थ भी जैसे और जिस रीति से हैं वे उसी रीति से विद्यमान हैं, इसलिये हे आत्मन्‌ ! तू उनके लिये किसी बात की चिंता न कर, अपने शुद्ध-चिद्रूप की ओर ध्यान दे ।